Sunday, 7 August 2011

बाजार

मे भी उन लोगो मे से एक हु जिन्हो ने बाजार मे तब गया जब मे २२ साल का हुआ . बहुत आसान था सब लगता था की मॆ ऎसी चीज जनता हू कि सब को मेरे पीछे चलना पडेगा . सो साहब मे स्टाक मार्केट् मे था ज्ञान का सागर बन के . दिन भर दुसरो को बताता . ऒर "इकोनोमिक टाईम्स्" बहुत् ध्यान से पठता .
वो समय ऐसा था की बाजार में "हर्षद मेहता" का बोल बाला था सुब कुछ मस्त चलता था बहुत ज्याद ज्ञान की आवश्यकता नहीं थी उस से पहले "धीरूभाई अम्बानी" पैसे की ताकत का पर्दर्शन कर चुके थे और बाजार भी नई सोच को ले रहा था लोगो को पता चल रहा था की दिमाग से पैसे बनाये जा सकते है. सो में घुस चुका था बाजार में .
बहुत संक्रमण का काल था राम मंदिर की भी आंधी चल रही थी .
तो साहब में बाजार में इस लिए गया था क्योकि किताबो के अनुसार उस में पैसे की बहुत ज्यादा जरूरत नहीं होती और में समझ ता भी नहीं था की पैसा की पैसा आपकी हिम्मत , ताकत ,बेईमानी ,ईमानदारी या आपके न डरने का एक पैमना है .ये बात में बहुत बाद में समझा की पैसे से पता चलता हे की आप में कितनी कब्लियात है.

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